Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.34 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.34

6.34
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ! एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ॥ ६-३४ ॥
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana ! etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām || 6-34 ||
— जो यह योग आपने कहा ; — समता के रूप में, हे मधुसूदन ; — इसकी मैं नहीं देखता ; — चञ्चलता के कारण स्थिर स्थिति

हे मधुसूदन, समता के रूप में जो यह योग आपने कहा है, मन की चञ्चलता के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति नहीं देखता।