Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.35 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.35

6.35
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याऽहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ६-३५ ॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham | tasyā'haṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram || 6-35 ||
— क्योंकि मन चञ्चल है, हे कृष्ण ; — क्षोभकारी, बलवान्, दृढ़ ; — इसका निग्रह मैं मानता हूँ ; — वायु के समान अत्यन्त कठिन

हे कृष्ण, मन तो चञ्चल, क्षोभ उत्पन्न करने वाला, बलवान् और दृढ़ है; इसका निग्रह मैं वायु के निग्रह के समान अत्यन्त कठिन मानता हूँ।