Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.36 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.36

6.36
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ६-३६ ॥
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam | abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate || 6-36 ||
— निःसन्देह, हे महाबाहु ; — मन दुर्निग्रह और चञ्चल ; — किन्तु अभ्यास से, हे कुन्तीपुत्र ; — और वैराग्य से वश में होता है

हे महाबाहु, निःसन्देह मन का निग्रह कठिन है और वह चञ्चल है; किन्तु हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से वह वश में किया जाता है।