असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
६-३६ ॥
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||
6-36 ||
हे महाबाहु, निःसन्देह मन का निग्रह कठिन है और वह चञ्चल है; किन्तु हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से वह वश में किया जाता है।