Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.37 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.37

6.37
असंयतात्मनो योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ६-३७ ॥
asaṃyatātmano yogo duṣprāpa iti me matiḥ | vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ || 6-37 ||
— असंयत आत्मा वाले के लिए योग ; — दुष्प्राप्य है — यह मेरा मत ; — किन्तु वश में किए आत्मा वाले यत्नशील से ; — वह उपाय से प्राप्य है

असंयत आत्मा वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है — यह मेरा मत है; किन्तु वश में किए हुए आत्मा वाले यत्नशील पुरुष के द्वारा वह उपाय से प्राप्त किया जा सकता है।