असंयतात्मनो योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
६-३७ ॥
asaṃyatātmano yogo duṣprāpa iti me matiḥ |
vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ ||
6-37 ||
असंयत आत्मा वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है — यह मेरा मत है; किन्तु वश में किए हुए आत्मा वाले यत्नशील पुरुष के द्वारा वह उपाय से प्राप्त किया जा सकता है।