Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.38 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.38

6.38
अयतः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । लिप्समानः सतां मार्गं प्रमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ६-३८ ॥
ayataḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ | lipsamānaḥ satāṃ mārgaṃ pramūḍho brahmaṇaḥ pathi || 6-38 ||
— असंयत किन्तु श्रद्धा से युक्त ; — योग से विचलित मन वाला ; — सत्पुरुषों के मार्ग की इच्छा रखता हुआ ; — ब्रह्म के मार्ग में मोहित

हे कृष्ण, असंयत किन्तु श्रद्धा से युक्त, और योग से विचलित मन वाला, सत्पुरुषों के मार्ग की इच्छा रखता हुआ भी ब्रह्म के मार्ग में मोहित पुरुष —