Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.39 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.39

6.39
अनेकचित्तोविभ्रान्तो मोहस्यैव वशं गतः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ६-३९ ॥
anekacittovibhrānto mohasyaiva vaśaṃ gataḥ | aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati || 6-39 ||
— अनेक चित्त वाला, विभ्रान्त ; — मोह के ही वश में गया ; — योग की संसिद्धि न पाकर ; — किस गति को, हे कृष्ण, जाता है

विभ्रान्त चित्त वाला, मोह के ही वश में गया हुआ, और योग की संसिद्धि को न पाकर — हे कृष्ण, किस गति को प्राप्त होता है?