अनेकचित्तोविभ्रान्तो मोहस्यैव वशं गतः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
६-३९ ॥
anekacittovibhrānto mohasyaiva vaśaṃ gataḥ |
aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati ||
6-39 ||
विभ्रान्त चित्त वाला, मोह के ही वश में गया हुआ, और योग की संसिद्धि को न पाकर — हे कृष्ण, किस गति को प्राप्त होता है?