Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.40 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.40

6.40
कच्चिन्नोभयविभ्रंशाच्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विनाशं वाधिगच्छति ॥ ६-४० ॥
kaccinnobhayavibhraṃśācchinnābhramiva naśyati | apratiṣṭho mahābāho vināśaṃ vādhigacchati || 6-40 ||
— क्या वह दोनों से भ्रष्ट होकर ; — छिन्न बादल के समान नष्ट नहीं होता ; — आश्रयरहित, हे महाबाहु ; — अथवा विनाश को प्राप्त नहीं होता

हे महाबाहु, क्या वह दोनों (योग और भोग) से भ्रष्ट होकर, आश्रयरहित होकर, छिन्न-भिन्न बादल के समान नष्ट नहीं हो जाता, अथवा विनाश को प्राप्त नहीं होता?