कच्चिन्नोभयविभ्रंशाच्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विनाशं वाधिगच्छति ॥
६-४० ॥
kaccinnobhayavibhraṃśācchinnābhramiva naśyati |
apratiṣṭho mahābāho vināśaṃ vādhigacchati ||
6-40 ||
हे महाबाहु, क्या वह दोनों (योग और भोग) से भ्रष्ट होकर, आश्रयरहित होकर, छिन्न-भिन्न बादल के समान नष्ट नहीं हो जाता, अथवा विनाश को प्राप्त नहीं होता?