Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.32 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.32

6.32
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ६-३२ ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ | sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate || 6-32 ||
— समस्त भूतों में स्थित मुझको जो ; — भजता है, एकत्व में स्थित ; — सब प्रकार से बरतता हुआ भी ; — वह योगी मुझमें ही बरतता है

जो एकत्व में स्थित होकर समस्त भूतों में स्थित मुझको भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।