सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
६-३२ ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate ||
6-32 ||
जो एकत्व में स्थित होकर समस्त भूतों में स्थित मुझको भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।