यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
६-३१ ॥
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||
6-31 ||
जो मुझे सर्वत्र देखता है और समस्त को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।