Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.31 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.31

6.31
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ६-३१ ॥
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati | tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati || 6-31 ||
— जो मुझे सर्वत्र देखता है ; — और समस्त को मुझमें देखता है ; — उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता ; — और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता

जो मुझे सर्वत्र देखता है और समस्त को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।