Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.18 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.18

5.18
स्मरन्तोऽपि मुहुस्त्वेतत्स्पृशन्तोऽपि स्वकर्मणि । सक्ता अपि न सज्जन्ति पङ्के रविकरा इव ॥ ५-१८ ॥
smaranto'pi muhustvetatspṛśanto'pi svakarmaṇi | saktā api na sajjanti paṅke ravikarā iva || 5-18 ||
— इसका बार-बार स्मरण करते हुए भी ; — अपने कर्म में संलग्न रहते हुए भी ; — आसक्त-से दिखकर भी आसक्त नहीं ; — जैसे कीचड़ पर सूर्य की किरणें

इसका बार-बार स्मरण करते हुए भी, और अपने कर्म में संलग्न रहते हुए भी, आसक्त-से दिखने वाले वे आसक्त नहीं होते — जैसे कीचड़ पर पड़ती हुई सूर्य की किरणें।