स्मरन्तोऽपि मुहुस्त्वेतत्स्पृशन्तोऽपि स्वकर्मणि ।
सक्ता अपि न सज्जन्ति पङ्के रविकरा इव ॥
५-१८ ॥
smaranto'pi muhustvetatspṛśanto'pi svakarmaṇi |
saktā api na sajjanti paṅke ravikarā iva ||
5-18 ||
इसका बार-बार स्मरण करते हुए भी, और अपने कर्म में संलग्न रहते हुए भी, आसक्त-से दिखने वाले वे आसक्त नहीं होते — जैसे कीचड़ पर पड़ती हुई सूर्य की किरणें।