Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.17 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.17

5.17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धौतकल्मषाः ॥ ५-१७ ॥
tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ | gacchantyapunarāvṛttiṃ jñānanirdhautakalmaṣāḥ || 5-17 ||
— जिनकी बुद्धि उसमें, आत्मा उसमें ; — उसमें निष्ठा, उसी के परायण ; — वे पुनरावृत्तिरहित अवस्था को जाते हैं ; — ज्ञान से धुले पाप वाले

जिनकी बुद्धि उसमें (ब्रह्म में) है, जिनका आत्मा उसमें है, जो उसमें निष्ठा रखते हैं और उसी के परायण हैं — वे ज्ञान से धुले हुए पाप वाले होकर पुनरावृत्तिरहित अवस्था को प्राप्त करते हैं।