Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.21 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.21

4.21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४-२१ ॥
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ | śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam || 4-21 ||
— आशारहित, मन-आत्मा को संयत किए ; — समस्त परिग्रह को त्यागकर ; — केवल शारीरिक कर्म ; — करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता

आशारहित, मन और आत्मा को संयत किए हुए, समस्त परिग्रह को त्यागकर केवल शारीरिक कर्म करता हुआ वह पाप को प्राप्त नहीं होता।