Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.22 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.22

4.22
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते ॥ ४-२२ ॥
yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ | samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvā'pi na nibadhyate || 4-22 ||
— अनायास प्राप्त में सन्तुष्ट ; — द्वन्द्वातीत, मात्सर्यरहित ; — सिद्धि-असिद्धि में समान ; — कर्म करके भी नहीं बँधता

अनायास प्राप्त वस्तु में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, मात्सर्यरहित, और सिद्धि-असिद्धि में समान रहने वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बँधता।