Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.23 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.23

4.23
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायारभतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ ४-२३ ॥
gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ | yajñāyārabhataḥ karma samagraṃ pravilīyate || 4-23 ||
— आसक्तिरहित, मुक्त के ; — ज्ञान में स्थित चित्त वाले के ; — यज्ञ के लिए कर्म करने वाले का ; — समग्र कर्म विलीन हो जाता है

आसक्तिरहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित चित्त वाले, यज्ञ के लिए कर्म करने वाले पुरुष का समग्र कर्म विलीन हो जाता है।