Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.24 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.24

4.24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ४-२४ ॥
brahmārpaṇaṃ brahmahavirbrahmāgnau brahmaṇā hutam | brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā || 4-24 ||
— अर्पण ब्रह्म, हवि ब्रह्म ; — ब्रह्माग्नि में ब्रह्म के द्वारा हवन किया ; — ब्रह्म ही उसके द्वारा प्राप्य ; — ब्रह्म-रूप कर्म में समाधि से

अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म-रूप अग्नि में ब्रह्म के द्वारा हवन किया गया; ब्रह्म-रूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष को ब्रह्म ही प्राप्त होता है।