Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.25 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.25

4.25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ ४-२५ ॥
daivamevāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate | brahmāgnāvapare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati || 4-25 ||
— कुछ योगी देवों के लिए यज्ञ ; — उपासना करते हैं ; — दूसरे ब्रह्माग्नि में यज्ञ को ; — यज्ञ के द्वारा ही हवन करते हैं

कुछ योगी देवों के लिए यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, तो दूसरे ब्रह्म-रूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।