Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.26 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.26

4.26
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ ४-२६ ॥
śrotrādīnīndriyāṇyanye saṃyamāgniṣu juhvati | śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati || 4-26 ||
— श्रोत्र आदि इन्द्रियों को कुछ ; — संयम-रूपी अग्नियों में हवन करते हैं ; — शब्द आदि विषयों को दूसरे ; — इन्द्रिय-रूपी अग्नियों में हवन करते हैं

कुछ लोग श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयम-रूपी अग्नियों में हवन करते हैं; दूसरे शब्द आदि विषयों को इन्द्रिय-रूपी अग्नियों में हवन करते हैं।