Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.27 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.27

4.27
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ ४-२७ ॥
sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare | ātmasaṃyamayogāgnau juhvati jñānadīpite || 4-27 ||
— समस्त इन्द्रिय-कर्मों को ; — और प्राण-कर्मों को दूसरे ; — आत्मसंयम-रूपी योगाग्नि में ; — हवन करते हैं, ज्ञान से प्रदीप्त

दूसरे समस्त इन्द्रिय-कर्मों और प्राण-कर्मों को ज्ञान से प्रदीप्त आत्मसंयम-रूपी योगाग्नि में हवन करते हैं।