Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.20 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.20

4.20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ ४-२० ॥
tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ | karmaṇyabhipravṛtto'pi naiva kiñcitkaroti saḥ || 4-20 ||
— कर्मफल में आसक्ति त्यागकर ; — नित्यतृप्त, निराश्रय ; — कर्म में भली-भाँति प्रवृत्त रहकर भी ; — वह कुछ नहीं करता

कर्मफल में आसक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और निराश्रय होकर, वह कर्म में भली-भाँति प्रवृत्त रहता हुआ भी कुछ नहीं करता।