Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.45 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.45

3.45
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ३-४५ ॥
indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate | etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam || 3-45 ||
— इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि ; — इसका अधिष्ठान कहे जाते हैं ; — इनके द्वारा यह मोहित करता है ; — ज्ञान को ढककर देहधारी को

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसका अधिष्ठान कहे जाते हैं; इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित करता है।