आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
३-४४ ॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā |
kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca ||
3-44 ||
हे कुन्तीपुत्र, ज्ञानी का ज्ञान इस नित्य शत्रु से ढका रहता है, जो काम-रूप है और कभी न भरने वाली अग्नि के समान है।