Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.44 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.44

3.44
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३-४४ ॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā | kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca || 3-44 ||
— इससे ज्ञान ढका रहता है ; — ज्ञानी का, इस नित्य शत्रु से ; — काम-रूप, हे कुन्तीपुत्र ; — और न भरने वाली अग्नि से

हे कुन्तीपुत्र, ज्ञानी का ज्ञान इस नित्य शत्रु से ढका रहता है, जो काम-रूप है और कभी न भरने वाली अग्नि के समान है।