Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.35 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.35

3.35
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मोदयादपिः ॥ ३-३५ ॥
śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt | svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmodayādapiḥ || 3-35 ||
— गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है ; — भली-भाँति आचरित परधर्म से ; — अपने धर्म में मरण श्रेयस्कर ; — परधर्म उन्नतिशील होने पर भी (भयकारक)

गुणरहित (अपूर्ण) अपना धर्म भी भली-भाँति आचरित पराये धर्म से श्रेष्ठ है; अपने धर्म में मरण भी श्रेयस्कर है, परधर्म तो उन्नतिशील होने पर भी भयकारक है।