श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मोदयादपिः ॥
३-३५ ॥
śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmodayādapiḥ ||
3-35 ||
गुणरहित (अपूर्ण) अपना धर्म भी भली-भाँति आचरित पराये धर्म से श्रेष्ठ है; अपने धर्म में मरण भी श्रेयस्कर है, परधर्म तो उन्नतिशील होने पर भी भयकारक है।