Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.34 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.34

3.34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४ ॥
indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau | tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau || 3-34 ||
— प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में ; — राग और द्वेष स्थित हैं ; — इन दोनों के वश में न आए ; — क्योंकि वे उसके मार्ग के विघ्न हैं

प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष स्थित हैं; इन दोनों के वश में न आए, क्योंकि ये उसके मार्ग में विघ्न डालने वाले शत्रु हैं।