Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.33 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.33

3.33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३-३३ ॥
sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi | prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati || 3-33 ||
— अपनी प्रकृति के अनुरूप चेष्टा करता है ; — ज्ञानवान् भी ; — भूत अपनी प्रकृति का अनुसरण करते हैं ; — निग्रह क्या करेगा

ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ही चेष्टा करता है; भूत अपनी प्रकृति का अनुसरण करते हैं — निग्रह क्या करेगा?