Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.32 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.32

3.32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुवर्तन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३-३२ ॥
ye tvetadabhyasūyanto nānuvartanti me matam | sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ || 3-32 ||
— किन्तु जो इसमें दोष ढूँढ़ते हुए ; — मेरे मत का अनुसरण नहीं करते ; — उन समस्त ज्ञान से सम्मोहितों को ; — नष्ट और विवेकहीन जान

किन्तु जो इसमें दोष ढूँढ़ते हुए मेरे मत का अनुसरण नहीं करते, उन्हें समस्त ज्ञान से सम्मोहित, नष्ट और विवेकहीन जानो।