इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
२-६९ ॥
indriyāṇāṃ hi caratāṃ yanmano'nuvidhīyate |
tadasya harati prajñāṃ vāyurnāvamivāmbhasi ||
2-69 ||
क्योंकि विचरण करती हुई इन्द्रियों में से जिसके पीछे मन चला जाता है, वही उसकी बुद्धि को हर ले जाती है, जैसे जल में नौका को वायु हर ले जाती है।