Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.68 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.68

2.68
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तम्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ २-६८ ॥
nāsti buddhirayuktasya na cāyuktamya bhāvanā | na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham || 2-68 ||
— अयुक्त की बुद्धि नहीं होती ; — और अयुक्त की भावना नहीं ; — भावनारहित को शान्ति नहीं ; — अशान्त को सुख कहाँ

अयुक्त (असंयमी) की बुद्धि नहीं होती, और अयुक्त की भावना (ध्यान-शक्ति) भी नहीं होती; भावनारहित को शान्ति नहीं, और अशान्त को सुख कहाँ?