Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.67 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.67

2.67
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ २-६७ ॥
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate | prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate || 2-67 ||
— उस प्रसाद में समस्त दुःखों का ; — उसके लिए नाश हो जाता है ; — क्योंकि प्रसन्नचित्त वाले की शीघ्र ; — बुद्धि भली-भाँति स्थिर हो जाती है

उस प्रसाद में उसके समस्त दुःखों का नाश हो जाता है; क्योंकि प्रसन्नचित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही भली-भाँति स्थिर हो जाती है।