Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.66 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.66

2.66
रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६६ ॥
rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran | ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati || 2-66 ||
— किन्तु राग-द्वेष से मुक्त इन्द्रियों से ; — विषयों में विचरता हुआ ; — अपने वश की इन्द्रियों वाला आत्मसंयमी ; — प्रसाद (निर्मलता) को प्राप्त होता है

किन्तु राग-द्वेष से मुक्त, अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ आत्मसंयमी पुरुष प्रसाद (निर्मलता) को प्राप्त होता है।