रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
२-६६ ॥
rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran |
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||
2-66 ||
किन्तु राग-द्वेष से मुक्त, अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ आत्मसंयमी पुरुष प्रसाद (निर्मलता) को प्राप्त होता है।