Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.27 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.27

2.27
अथवैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥ २-२७ ॥
athavainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṃ mahābāho nainaṃ śocitumarhasi || 2-27 ||
— अथवा यदि इसे नित्य जन्म लेने वाला ; — अथवा नित्य मरने वाला मानो ; — तब भी हे महाबाहु ; — इसके लिए शोक करना उचित नहीं

और यदि तुम इसे नित्य जन्म लेने वाला और नित्य मरने वाला भी मानो, तब भी हे महाबाहु, इसके लिए शोक करना तुम्हें उचित नहीं।