अथवैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥
२-२७ ॥
athavainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam |
tathāpi tvaṃ mahābāho nainaṃ śocitumarhasi ||
2-27 ||
और यदि तुम इसे नित्य जन्म लेने वाला और नित्य मरने वाला भी मानो, तब भी हे महाबाहु, इसके लिए शोक करना तुम्हें उचित नहीं।