Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.28 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.28

2.28
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २-२८ ॥
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca | tasmādaparihārye'rthe na tvaṃ śocitumarhasi || 2-28 ||
— क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित ; — और मरे हुए का जन्म निश्चित ; — अतः जो टाला नहीं जा सकता उस विषय में ; — तुझे शोक करना उचित नहीं

क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है; अतः जो टाला नहीं जा सकता, उस विषय में तुम्हें शोक करना उचित नहीं।