Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.16 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.16

2.16
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ! । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ २-१६ ॥
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha ! | samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpate || 2-16 ||
— जिस पुरुष को ये व्यथित नहीं करते ; — हे पुरुषश्रेष्ठ ; — सुख-दुःख में समान, धीर को ; — वह अमरत्व के योग्य होता है

हे पुरुषश्रेष्ठ, सुख-दुःख में समान रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं करते, वह अमरत्व के योग्य होता है।