यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ! ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
२-१६ ॥
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha ! |
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpate ||
2-16 ||
हे पुरुषश्रेष्ठ, सुख-दुःख में समान रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं करते, वह अमरत्व के योग्य होता है।