Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.15 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.15

2.15
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ! ॥ २-१५ ॥
mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ | āgamāpāyino'nityāstāṃstitikṣasva bhārata ! || 2-15 ||
— किन्तु इन्द्रियों के विषयों के स्पर्श ; — हे कुन्तीपुत्र ; — शीत-उष्ण, सुख-दुःख देने वाले ; — आने-जाने वाले, अनित्य ; — उन्हें सहन करो ; — हे भारत

हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के विषयों के स्पर्श शीत-उष्ण और सुख-दुःख देने वाले हैं; ये आने-जाने वाले और अनित्य हैं — हे भारत, इन्हें सहन करो।