Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.14 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.14

2.14
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ २-१४ ॥
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā | tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati || 2-14 ||
— इस देह में देही (आत्मा) के लिए जैसे ; — बाल्य, यौवन, जरा ; — वैसे ही दूसरे शरीर की प्राप्ति ; — धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता

जैसे इस देह में देही (आत्मा) के लिए बाल्य, यौवन और जरा आते हैं, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होते।