देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
२-१४ ॥
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||
2-14 ||
जैसे इस देह में देही (आत्मा) के लिए बाल्य, यौवन और जरा आते हैं, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होते।