Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.17 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.17

2.17
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २-१७ ॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥ || 2-17 ||
— असत् का कोई भाव (अस्तित्व) नहीं ; — सत् का अभाव नहीं होता ; — दोनों का ही अन्त (निश्चय) देख लिया गया ; — इन दोनों के विषय में तत्त्वदर्शियों द्वारा

असत् का कोई भाव (अस्तित्व) नहीं होता और सत् का अभाव नहीं होता; तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों का ही अन्त (निश्चित स्वरूप) देख लिया है।