त्वं मानुष्येणोपहतान्तरात्मा विषादमोहाभिभवाद्विसंज्ञः ।
कृपागृहीतः समवेक्ष्य बन्धू- भिप्रपन्नान्मुखमन्तकस्य ॥
२-११ ॥
tvaṃ mānuṣyeṇopahatāntarātmā viṣādamohābhibhavādvisaṃjñaḥ |
kṛpāgṛhītaḥ samavekṣya bandhū- bhiprapannānmukhamantakasya ||
2-11 ||
तुम — जिसकी अन्तरात्मा केवल मानवीय भाव से आहत है, जो विषाद और मोह के अभिभव से विसंज्ञ हो गया है, जो मृत्यु के मुख में आए हुए बन्धुओं को देखकर करुणा से ग्रस्त है —