Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.20 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.20

14.20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ १४-२० ॥
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān | janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnute || 14-20 ||
— इन तीनों गुणों को लाँघकर ; — देही, देह से उत्पन्न उन्हें ; — जन्म, मृत्यु, जरा, दुःखों से मुक्त ; — अमृत का अनुभव करता है

देह से उत्पन्न इन तीनों गुणों को लाँघकर देही जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से मुक्त होकर अमृत का अनुभव करता है।