Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.19 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.19

14.19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १४-१९ ॥
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭā'nupaśyati | guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so'dhigacchati || 14-19 ||
— जब गुणों के अतिरिक्त अन्य कर्ता को ; — द्रष्टा नहीं देखता ; — और गुणों से परे (तत्त्व) को जानता है ; — वह मेरे भाव को प्राप्त होता है

जब द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता, और गुणों से परे (तत्त्व) को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।