नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
१४-१९ ॥
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭā'nupaśyati |
guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so'dhigacchati ||
14-19 ||
जब द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता, और गुणों से परे (तत्त्व) को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।