कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥
१४-२१ ॥
kairliṅgaistrīnguṇānetānatīto bhavati prabho |
kimācāraḥ kathaṃ caitāṃstrīnguṇānativartate ||
14-21 ||
हे प्रभो, इन तीनों गुणों को लाँघ चुका पुरुष किन लक्षणों से पहचाना जाता है? उसका आचार कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों को कैसे लाँघता है?