Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.21 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.21

14.21
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ १४-२१ ॥
kairliṅgaistrīnguṇānetānatīto bhavati prabho | kimācāraḥ kathaṃ caitāṃstrīnguṇānativartate || 14-21 ||
— किन इन तीनों गुणों को ; — लाँघ चुका होता है, हे प्रभो ; — किस आचार वाला, और कैसे ; — इन तीनों गुणों को लाँघता है

हे प्रभो, इन तीनों गुणों को लाँघ चुका पुरुष किन लक्षणों से पहचाना जाता है? उसका आचार कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों को कैसे लाँघता है?