Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.59 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.59

11.59
भक्त्या त्वनन्यया शक्य ह्यहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ११-५९ ॥
bhaktyā tvananyayā śakya hyahamevaṃvidho'rjuna | jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca parantapa || 11-59 ||
— किन्तु अनन्य भक्ति से ही मैं सम्भव ; — इस प्रकार के रूप वाला, हे अर्जुन ; — तत्त्व से जाना और देखा जाना ; — और (मुझमें) प्रवेश किया जाना, हे परन्तप

किन्तु हे अर्जुन, अनन्य भक्ति से ही इस प्रकार के रूप वाला मैं तत्त्व से जाना, देखा और (मुझमें) प्रवेश किया जा सकता हूँ, हे परन्तप।