Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.58 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.58

11.58
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ११-५८ ॥
nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā | śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā || 11-58 ||
— न मैं वेदों से, न तप से, न दान से ; — और न यज्ञ से ; — इस प्रकार के रूप में देखा जा सकता हूँ ; — जैसा तूने मुझे देखा है

न वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही, मैं इस प्रकार के रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसा तूने मुझे देखा है।