Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.57 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.57

11.57
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ११-५७ ॥
sudurdarśamidaṃ rūpaṃ dṛṣṭavānasi yanmama | devā apyasya rūpasya nityaṃ darśanakāṅkṣiṇaḥ || 11-57 ||
— यह अत्यन्त दुर्लभ-दर्शन रूप ; — मेरा, जिसे तूने देखा ; — देवता भी इस रूप के ; — नित्य दर्शन की आकांक्षा रखते हैं

मेरा यह रूप, जिसे तूने देखा, अत्यन्त दुर्लभ-दर्शन है; देवता भी इस रूप के दर्शन की नित्य आकांक्षा रखते हैं।