Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.60 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.60

11.60
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ११-६० ॥
matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ | nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava || 11-60 ||
— जो मेरे कर्म करता है, मुझे परम मानता है ; — मेरा भक्त, आसक्ति से रहित ; — समस्त भूतों में वैररहित ; — वह जो ऐसा है मुझे प्राप्त होता है, हे पाण्डव

हे पाण्डव, जो मेरे कर्म करता है, मुझे परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है, और समस्त भूतों में वैररहित है — वह मुझे प्राप्त होता है।