Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.53 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.53

11.53
न वेदयज्ञाधिगमनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपं शक्यमाहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ११-५३ ॥
na vedayajñādhigamanairna dānai- rna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ | evaṃrūpaṃ śakyamāhaṃ nṛloke draṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra || 11-53 ||
— न वेद-यज्ञ के अध्ययन से, न दानों से ; — न क्रियाओं से, न उग्र तपों से ; — इस रूप वाला मैं, मनुष्यलोक में ; — तुझसे अन्य द्वारा देखा जाना सम्भव नहीं, हे कुरुप्रवीर

हे कुरुप्रवीर, न वेद और यज्ञ के अध्ययन से, न दानों से, न क्रियाओं से, और न उग्र तपों से ही, मनुष्यलोक में इस रूप वाले मुझे तुझसे अन्य कोई देखने में समर्थ है।