न वेदयज्ञाधिगमनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपं शक्यमाहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥
११-५३ ॥
na vedayajñādhigamanairna dānai- rna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ |
evaṃrūpaṃ śakyamāhaṃ nṛloke draṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra ||
11-53 ||
हे कुरुप्रवीर, न वेद और यज्ञ के अध्ययन से, न दानों से, न क्रियाओं से, और न उग्र तपों से ही, मनुष्यलोक में इस रूप वाले मुझे तुझसे अन्य कोई देखने में समर्थ है।