Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.54 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.54

11.54
मा ते व्यथा मा च विमूढत भूद् दृष्ट्वा रूपं घोरमुग्रं ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ११-५४ ॥
mā te vyathā mā ca vimūḍhata bhūd dṛṣṭvā rūpaṃ ghoramugraṃ mamedam | vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṃ tadeva me rūpamidaṃ prapaśya || 11-54 ||
— तुझे न व्यथा हो, न मूढ़ता ; — मेरे इस घोर, उग्र रूप को देखकर ; — भयरहित, प्रसन्न मन से फिर तू ; — मेरे इसी (पूर्व) रूप को देख

मेरे इस घोर और उग्र रूप को देखकर तुझे न व्यथा हो और न मूढ़ता हो; भयरहित और प्रसन्न मन वाला होकर तू फिर मेरे इसी (पूर्व) रूप को देख।