Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.52 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.52

11.52
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ११-५२ ॥
mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt | tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam || 11-52 ||
— मुझ प्रसन्न के द्वारा तुझे, हे अर्जुन, यह ; — परम रूप अपने योग से दिखाया ; — तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त, आद्य ; — जो तुझसे अन्य किसी ने पहले नहीं देखा

हे अर्जुन, मुझ प्रसन्न के द्वारा अपने योग से तुझे यह परम रूप दिखाया गया — तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त, आद्य — जो तुझसे अन्य किसी ने पहले कभी नहीं देखा।