मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥
११-५२ ॥
mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt |
tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam ||
11-52 ||
हे अर्जुन, मुझ प्रसन्न के द्वारा अपने योग से तुझे यह परम रूप दिखाया गया — तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त, आद्य — जो तुझसे अन्य किसी ने पहले कभी नहीं देखा।