Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.51 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.51

11.51
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ११-५१ ॥
kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahasta- micchāmi tvāṃ draṣṭumahaṃ tathaiva | tenaiva rūpeṇa caturbhujena sahasrabāho bhava viśvamūrte || 11-51 ||
— मुकुट, गदा, हाथ में चक्र वाले ; — मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ ; — उसी चतुर्भुज रूप वाले ; — हे सहस्रबाहु, हो जाइए, हे विश्वमूर्ते

मैं आपको वैसे ही मुकुट वाला, गदा वाला, हाथ में चक्र वाला देखना चाहता हूँ; हे सहस्रबाहु, हे विश्वमूर्ते, आप उसी चतुर्भुज रूप वाले हो जाइए।