Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.50 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.50

11.50
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ११-५० ॥
adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito'smi dṛṣṭvā bhayena ca pravyathitaṃ mano me | tadeva me darśaya deva rūpaṃ prasīda deveśa jagannivāsa || 11-50 ||
— पहले न देखे हुए को देखकर मैं हर्षित ; — और भय से मेरा मन व्यथित ; — वही (पूर्व) रूप मुझे दिखाइए, हे देव ; — प्रसन्न होइए, हे देवेश, हे जगन्निवास

पहले कभी न देखे हुए (रूप) को देखकर मैं हर्षित हूँ, और भय से मेरा मन व्यथित भी है; हे देव, आप मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए; हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।