Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.23 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.23

11.23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम् ॥ ११-२३ ॥
rūpaṃ mahatte bahuvaktranetraṃ mahābāho bahubāhūrupādam | bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃ dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitāstathā'ham || 11-23 ||
— आपका महान् रूप, बहुमुख-नेत्र वाला ; — हे महाबाहु, अनेक भुजा-जंघा-चरण वाला ; — अनेक उदरों वाला, अनेक दाढ़ों से विकराल ; — देखकर लोक व्यथित हैं, और मैं भी

हे महाबाहु, अनेक मुखों और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जंघाओं और चरणों वाले, अनेक उदरों वाले, अनेक दाढ़ों से विकराल आपके इस महान् रूप को देखकर लोक व्यथित हैं, और मैं भी।