Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.24 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.24

11.24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ ११-२४ ॥
nabhaḥspṛśaṃ dīptamanekavarṇaṃ vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram | dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo || 11-24 ||
— आकाश को छूते, प्रज्वलित, अनेकवर्ण ; — फैले मुखों और प्रज्वलित विशाल नेत्रों वाले ; — आपको देखकर मेरी व्यथित अन्तरात्मा ; — न धैर्य पाती है न शान्ति, हे विष्णु

हे विष्णु, आकाश को छूते हुए, प्रज्वलित, अनेक वर्ण वाले, फैले हुए मुखों और प्रज्वलित विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर मेरी अन्तरात्मा व्यथित है; मैं न धैर्य पाता हूँ, न शान्ति।